दीपांकर भट्टाचार्य का लेख : प्रतिरोध, नई शुरुआत और ‘इंडिया’ गठबंधन का भविष्य

यह शायद पहला मौका है जब कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) ब्लॉक के नेताओं की मीटिंग में दिया गया अपना भाषण आम जनता के सामने रखा। उन्होंने जिस तरह से संघ-भाजपा द्वारा भारतीय गणराज्य की संवैधानिक बुनियाद पर हो रहे हमलों के खिलाफ, और करोड़ों हिंदुस्तानियों की आज़ादी और रोज़ी-रोटी पर मंडराते खतरों के खिलाफ एक एकजुट प्रतिरोध खड़ा करने की बात कही है, वह तारीफ के काबिल है।

हालांकि, सही में मजबूत और टिकाऊ प्रतिरोध खड़ा करने के लिए कुछ रचनात्मक सुझावों पर गौर करना भी जरूरी है।

मैंने ‘इंडिया’ गठबंधन की अब तक की सभी बैठकों में हिस्सा लिया है, जिसमें जून 2023 में पटना, बिहार में हुई वह शुरुआती बैठक भी शामिल है, जब गठबंधन ने अभी ‘इंडिया’ नाम भी नहीं अपनाया था। राहुल गांधी का यह जोशीला भाषण ऐसे समय आया है, जब भाजपा के ‘डबल इंजन’ और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकारें 20 से ज़्यादा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सत्ता पर काबिज़ है।

उनका भाषण जहाँ एक ओर भरोसा जगाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ चिंताएं भी पैदा करता है। कांग्रेस की बैठक में यह भाषण पूरी तरह असरदार लगता, लेकिन 23 अलग-अलग विचारधाराओं वाली पार्टियों के उस साझा मंच पर, जो भारत के संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य की रक्षा के लिए एकजुट हुआ है, इसके कुछ हिस्से बेसुरे लगे।

राहुल गांधी यह याद दिलाने में बिल्कुल सही हैं कि “पूर्ण स्वराज” को आधिकारिक लक्ष्य घोषित करने के बाद कांग्रेस एक प्रतिरोध आंदोलन के रूप में उभरी। यह प्रस्ताव 1927 के मद्रास अधिवेशन में रखा गया, और दो साल बाद 1929 के लाहौर अधिवेशन में पास हुआ। इसके बाद वाकई कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई में सबसे बड़ी ताक़त बनकर सामने आई, जिसमें कम्युनिस्ट, समाजवादी और फुले-अंबेडकर-पेरियार की धारा भी अहम हिस्सेदार रही।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘पूर्ण स्वराज’ का विचार सबसे पहले 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में दो कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों, मौलाना हसरत मोहानी और स्वामी कुमारानंद ने रखा था। इसी तरह 1928 में ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ की स्थापना करके भगत सिंह और उनके साथियों ने भी अपने समाजवादी राजनीतिक लक्ष्य को साफ़ और बेबाक़ ढंग से देश के सामने रखा।

तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ाई

आज की लड़ाई एक ओर उस इकलौती विचारधारा और दूसरी ओर उन तमाम विचारधाराओं के बीच है, जो मिलकर हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई लड़ीं और उसे जीतकर दिखाया। वह इकलौती विचारधारा आज़ादी की लड़ाई से दूर रही, बल्कि कई मौकों पर उसका विरोध भी करती रही।

‘इंडिया’ गठबंधन इन्हीं ताक़तों की नई गोलबंदी है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति का मुकाबला कर रही है। आरएसएस-भाजपा अपने वैचारिक एजेंडे को लागू करने के लिए सरकारी संस्थाओं और संसदीय लोकतंत्र के पूरे ढाँचे को तोड़-मरोड़ कर अपने हिसाब से ढालने में लगी है।

अगर भाजपा को अपनी ‘एक राष्ट्र, एक पार्टी’ की मुहिम आगे बढ़ाने की खुली छूट मिलती है, तो कांग्रेस भी अन्य पार्टियों की तरह ही भारी नुकसान उठाएगी; बल्कि सच तो यह है कि कांग्रेस कई बार ज्यादा कमज़ोर साबित हुई है। भले ही हमारा आजादी का इतिहास गौरवशाली रहा हो, लेकिन आज जिस तरह का चौतरफ़ा फासीवादी हमला और वैचारिक आक्रमण हो रहा है, उसके सामने किसी भी पार्टी के पास ऐसा कोई वैचारिक कवच या सुरक्षा नहीं है, जो उसे अपने-आप बचा सके।

खुद भाजपा ऐसे नेताओं से भरी पड़ी है जो कुछ समय पहले तक कांग्रेस में थे। एक ओर राहुल गांधी भाजपा के ख़िलाफ़ डटकर लड़ने की बात कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर तेलंगाना में कांग्रेस के मुख्यमंत्री हैदराबाद के विवादास्पद बुलडोज़र अभियान का बचाव करते हुए गर्व के साथ हिटलर का हवाला दे रहे थे।

अगर सारी संस्थाओं पर क़ब्ज़ा कर लिया जाए और मतदाता सूची से लेकर वोटों की गिनती और नतीजों के ऐलान तक पूरी चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ की जाए, तो उस जनता के सामने क्या रास्ता बचता है जिसे ऐसा संविधान विरासत में मिला है, जो भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में परिभाषित करता है?

राहुल गांधी बिल्कुल सही कह रहे हैं कि इसका एकमात्र जवाब प्रतिरोध है — ऐसा प्रतिरोध जो छिटपुट या सिर्फ़ प्रतीकात्मक न हो, बल्कि लगातार चलने वाला, व्यापक और दृढ़ जनवादी प्रतिरोध हो।

एक इंसाफ़-पसंद गणतंत्र की ओर

अब हम उन नीतियों को और नहीं झेल सकते जिन्होंने देश और उसकी बड़ी आबादी को तबाही की तरफ़ धकेल दिया है। चंद बड़े कॉरपोरेट घरानों को भारत के सारे संसाधन सौंपने, जनता को कंगाली में धकेलने तथा पर्यावरण को तबाह करने वाले याराना पूंजीवाद के आर्थिक मॉडल को अब जाना ही होगा। एक ऐसी विदेश नीति, जो हिंदुस्तान की रणनीतिक स्वायत्तता को अमेरिका-इज़राइल की हमलावर धुरी के हाथों गिरवी रख दे, जबकि भारतीय नाविक अमेरिकी मिसाइलों से मारे जा रहे हों, फौरन बदलनी चाहिए।

आदिवासियों की ज़मीन और जंगल पर उनके अधिकारों पर हमले, और उन्हें मिले संवैधानिक संरक्षण को छीनने की कोशिशों पर रोक लगनी चाहिए। बुलडोज़र और एनकाउंटर का महिमामंडन करने तथा हर असहमत आवाज़ को मुजरिम बनाने वाली शासन व्यवस्था का किसी जनवादी गणतंत्र में कोई स्थान नहीं हो सकता।

इसी तरह, धार्मिक वर्चस्व और बहिष्कार के आधार पर राष्ट्र की पहचान तय करने वाली सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को भी नकारना होगा और आख़िर में, अपनी विश्वसनीयता और पारदर्शिता खो चुकी चुनावी व्यवस्था में व्यापक और तत्काल सुधार किए जाने चाहिए।

बेशक, यह प्रतिरोध पहले से ही जारी है। किसानों ने 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वापस लेने पर मजबूर किया और सात साल बाद तीनों कृषि क़ानून भी रद्द करवाए। 2019 में शाहीन बाग़ से शुरू हुए विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ आंदोलन ने पूरे देश में विरोध की एक लहर पैदा कर दी। बड़ी संख्या में लोगों ने इसे संविधान के बुनियादी मूल्यों पर हमला माना।

हाल के दिनों में हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और एनसीआर में बढ़ते काम के बोझ और घटती मज़दूरी के ख़िलाफ़ मज़दूरों के विरोध प्रदर्शनों ने आम लोगों की चिंताजनक आर्थिक बदहाली की गहराती तस्वीर सामने रखी है।

वहीं, कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई, वामपंथी छात्र संगठनों — ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) और स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़आई) — से लेकर सोशल मीडिया पर उभरे नए मंच कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) तक, छात्र-युवा शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था के गहराते संकट पर जवाबदेही की माँग को बुलंद कर रहे हैं।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि इस प्रतिरोध की लोगों ने कितनी भारी क़ीमत चुकाई है। दिल्ली की सरहदों पर चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान 700 से ज़्यादा किसान शहीद हुए। फ़ादर स्टैन स्वामी की हिरासत में मौत हो गई. एल्गार परिषद और सीएए विरोधी आंदोलन से जुड़े सुरेंद्र गडलिंग, उमर ख़ालिद, शरजील इमाम समेत अनेक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता सालों से जेलों में बंद हैं।

मज़दूरों और जन आंदोलनों के कार्यकर्ताओं को अपने बुनियादी अधिकारों और न्यायपूर्ण मज़दूरी की माँग उठाने पर जेल भेजा जा रहा है। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक दुर्लभ अपवाद नज़र आते हैं, जिन्हें रासुका के तहत महीनों तक क़ैद में रखने के बाद बिना किसी साफ़ वजह के रिहा कर दिया गया। पत्रकार भी इस दमन से अछूते नहीं रहे। प्रबीर पुरकायस्थ उन गिने-चुने लोगों में हैं जिन्हें लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कुछ राहत मिल सकी।

अब जनता के इस साहस, त्याग और अडिग संघर्ष की तुलना राजनीतिक दलों की मौजूदा हालत से कीजिए। डर, दमन और सत्ता के लालच के आगे कई पार्टियाँ या तो टूट रही हैं या भीतर से बिखरती जा रही हैं। यह हमें याद दिलाता है कि प्रतिरोध खड़ा करने की बात करते समय हमें कितना विनम्र होना चाहिए।

‘इंडिया’ गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इन जारी जनसंघर्षों से अपने रिश्ते मज़बूत करे, जनता के भीतर बढ़ रहे मोहभंग, ग़ुस्से और बदलाव की उम्मीदों को अपनी ताक़त बनाए, इंसाफ़ की माँगों को और बुलंद करे तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे साझा प्रतिरोध को और मज़बूत बनाए।

विपक्ष में नई जान फूंकने की ज़रूरत

समान नागरिकता की मुहिम, ऐतिहासिक किसान आंदोलन, ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का संदेश और बीच-बीच में आए हौसला बढ़ाने वाले चुनावी नतीजे—चाहे वह 2020 में बिहार में भाजपा की बेहद संकीर्ण जीत हो, या पश्चिम बंगाल (2021) और कर्नाटक (2023) में उसकी हार—इन सबने मिलकर ही 2023 में ‘इंडिया’ गठबंधन के उभरने के लिए मुफ़ीद ज़मीन तैयार की।

जनता दल (यूनाइटेड) और राष्ट्रीय लोक दल के बाहर निकलने, और पश्चिम बंगाल, केरल व पंजाब जैसे राज्यों में चुनावी तालमेल न होने के बावजूद, 2024 में ‘इंडिया’ गठबंधन भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को हराने के बेहद करीब पहुँच गया था। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कुछ हद तक बिहार के नतीजों ने गठबंधन की ताक़त दिखाई; कांग्रेस 100 सीटों तक पहुँची और पूरे गठबंधन का आँकड़ा 234 सीटों तक जा पहुँचा।

इसके बाद से एक के बाद एक चुनावी झटके—2024 में महाराष्ट्र और हरियाणा और 2025 में दिल्ली में हार—ने ‘इंडिया’ गठबंधन की ताक़त और असर को कमज़ोर किया है। बहुआयामी चुनावी अनियमितताओं की मदद से इन हारों ने हिंदुस्तान की बची-खुची चुनावी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भाजपा की पकड़ को और मज़बूत कर दिया है। साफ़ है कि ऐसे में ‘इंडिया’ गठबंधन को अब एक नई ऊर्जा और दिशा की ज़रूरत है।

इस दौर में राहुल गांधी की दोहरी ज़िम्मेदारी है: एक तरफ़ कांग्रेस में नई जान फूंकना, और दूसरी तरफ़ गठबंधन के व्यापक मंच को मज़बूत करना। यह तभी हो सकता है जब अलग-अलग इतिहास और विचारधारा वाले सभी दलों के बीच आपसी सम्मान, भरोसा और तालमेल बना रहे। अगर भारत देश ‘विविधता के ज़रिए एकता’ से ही आगे बढ़ सकता है, तो ‘इंडिया’ गठबंधन की कामयाबी का रास्ता भी यही है।

(16 जून 2026 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित लेख का अनुवाद)

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